Friday, October 30, 2020

२१ - निर्मल चेतन देश ।

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२१ - निर्मल चेतन देश ।

     यह तो मालूम हो चुका है कि मनुष्य का मन उसकी सुरत के अधीन है और मन को चेतनता और शक्ति अपनी क्रियाएँ करने के लिये सुरत ही से मिलती हैं और उसका सुरत के साथ बंधन है । जो हाल मनुष्य के मन का है वही हाल ब्रह्मांडी मन का भी है । हमारे इस विचार से हरचंद सुरत और मन के अंदरुनी ताल्लुक पर बहुत कुछ रोशनी पड़ जाती है लेकिन यह वाजह नहीं होता कि निर्मल चेतन देश के स्थान इस रचना में कहाँ पर वाकै है इस लिये यह बात दरयाफ्त करने के लिये हम इस मजमून की तहक्रीकात दूसरे ढंग से करते हैं । 


     दफा १३ में यह दिखलाया गया था कि स्थूल शरीर के ( उसके सूक्ष्म रूपों के समेत ) अलहदा होने पर सुरत यानी जीवात्मा के सब खबास ज्यादा ताकतवर हो जाते हैं और बहुत सी नई शक्तियाँ भी जाग उठती हैं और दफा ९ में हमने यह दिखलाया था कि मन मुरत का एक मौज्ञार है जिसकी मारफत सुरत अपनी चेतन क्रियाएँ करती है और मन से मुरत की धार के खिंच जाने पर यह बिलकुल बेकार हो जाता है । इससे नतीजा निकलता है कि मनुष्य का मन भी मुरत के लिये एक वैसा ही पर्दा है जैसा कि स्थूल शरीर । इस लिये सुरत के ऊपर से मन का पर्दा उतरने पर वैसे ही नतीजे जहूर में आने चाहिए जैसे स्थूल शरीर का पर्दा हटने की निसवत ऊपर बयान किये गये हैं . यानो मन का पर्दा हटने पर खालिस रूहानी स्वास यानी निर्मल चेतन - अंग ( मानसिक अंग जिनका सिर्फ आभास या छाया है ) प्रकट होंगे और इन खवास या अंगों को पहुँच मन की निसबत कहीं ज्यादा होगी और मुरत की उस हालत की हर एक क्रिया के अंदर चेतन - शक्ति के तीन निज स्रवास यानी सत्ता , चेतनता और आनंद की कैफियत जरूर नुमायाँ होगी और उसके अंदर दुःख व क्लेश का नाम व निशान भी न होगा । अब अगर इस दलील को ब्रह्मांड पर घटा कर देखा जाये तो नतीजा निकलता है कि मुरत के भंडार के ऊपर से ब्रह्मांडी मन का पर्दा दूर करने पर हमको निर्मल चेतन देश यानी हमारी तहकीकात का निशाना मिल जावेगा । मगर इस नतीजे से हमारी पूरी मतलबबरारी नहीं होती क्योंकि इससे यह मालूम नहीं होता कि ब्रह्म क्यों पैदा किया गया और क्यों उसका मुरत के भंडार के संग संबंध कायम किया गया है और क्यों अब उसको सुरत के भंडार से अलहदा किया जावे | इन बातों का मुफ़स्सल बयान तो रचना भाग में किया जावेगा यहाँ पर मुख़्तसर तौर पर इतना ही जतलावेंगे कि निर्मल चेतन देश , जो ब्रह्मांड के परे वाकै है , छः उपभागों में मुनकसिम है और इसी तकसीम की वजह ने निर्मल चेतन धार के ब्रह्मांड देश में उतरने पर ब्रह्मांड के अंदर इसी नमूने के छः स्थान जाहिर हुए ।

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Thursday, October 29, 2020

२० - ब्रह्मांडी मन का देश और उसके छः उपभाग ।

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२० - ब्रह्मांडी मन का देश और उसके छः उपभाग ।

 
        मन के स्नयालात और राग द्वेष का हमारे शरीर पर भारी असर पड़ता है यानी हरचंद खयालात और राग द्वेष मन के अंदर व्यापते हैं लेकिन शरीर पर भी उनका भारी प्रभाव पड़ता है । इसके समझाने के लिये हम एक दृष्टांत देते है । सवाल करो कि कोई चिड़चिड़े मिजाज वाला शाम है जो छोटी छोटी पातों पर वक्त बेवव्रत क्रोध में आ जाता है । क्रोधवश होने पर उसके चेहरे की रगें खास तौर पर खिंच जाती हैं कि क्रोध अंग उसके अंदर बार बार प्रकट होता है इस लिए नसें बार बार एक ही तौर पर खिंचती हैं । बार बार खिंचाव होने से चेहरे की नसों का तनाव मुस्तकिल तौर पर कायम हो जाता है ; यहाँ तक कि उसकी मौलाद के अंदर भी वह अंग पहुँच जाता है । इस दृष्टांत की बुनियाद पर कहा जा सकता है कि मनुष्य के मन के अंदर जो भाव प्रबल होता है उसका अक्स उसके शरीर पर जाहिर हुआ करता है और उसके बीज की मारफत ऐसे भाव उसकी नसल के अंदर प्रवेश कर जाते हैं । लेकिन अगर यह उसूल मनुष्य के अंशरूप मन व सुरत के घाटों पर थोड़ी देर ब्यापने वाली अवस्थाओं की निसबत दुरुस्त है तो पालमे कबीर के घाटों और मन व सुरत के सब केंद्रों की निसयत भी दुरुस्त होना चाहिए । इस लिए इस उपल से और मनुष्य शरीर की निसवत जो भेद पीछे दरपात हुआ उसकी रू से नतीजा निकलता है कि पालमे कबीर में मनुष्य शरीर के छः चक्रों के मुताविक छः स्थान मौजूद हैं और उनके परे मुरत के भंडार से मिला हुआ प्रमांटी मन का एक भारी देश है , जिसमें मनुष्प शरीर के अंदर निवासी अंशरूप मन के स्थानों के मुवाफिक छः स्थान कायम हैं ।

      संतमत में ब्रह्मांडी मन के इस देश को ब्रह्मांड कहते हैं , जिसके लफ़्जी मानी ब्रह्म यानी ब्रह्मांडी मन का अंडाकार देश है । इस ब्रह्मांड देश में परब्रह्मपद ( अझ से परे का मंडल ) भी शामिल है । बगैर इस पद के शामिल किये ब्रह्मांड के छः उपभाग पूरे नहीं होते और ऐसी सूरत में मनुष्य - शरीर के छः चक्रों और ब्रह्मांड के स्थानों में ( जिनकी कि छ : चक्र छाया है ) पूरी मुतायिकत नहीं होती । 

     दफा १८ में यह बयान हुआ था कि मनुष्य - शरीर का छठा चक्र सुरत की बैठक का स्थान है और पाँचवें चक्र में सूक्ष्म प्राण का और चौथे चक्र में मन का निवास है । इन मुकामों पर और नीज़ बाकी ' के और चक्रों के मुक्कामों पर जो रगों के केंद्र ( Nerve Centres ) दिखलाई देते हैं वे सब स्थूल मसाले से बने हैं लेकिन शक्ति के केंद्र ( Force Centres ) , जो उन चक्रों के मुतअल्लिक हैं , निहायत सूक्ष्म हैं और उनका रचना यानी पालमे कबीर के अंदर अपने संबंधी सूक्ष्म मंडलों से बरावर तअल्लुक यानी मेल रहता है और यह भी देखने में आता है कि इन रगों के केंद्रों में सुरत की ताकत मन के पर्दे की मारफत आती है क्योंकि चौथे चक्र की ( जोकि मन की बैठक का स्थान है ) क्रिया बंद होने पर तमाम शरीर की काररवाई मुलतवी हो जाती है । इससे जाहिर है कि छः चक्रों की कारवाई सुरत और मन दोनों मिलकर करते हैं और ब्रह्मांड के छः उपभागों का भी यही हाल है । इस बयान की रू से ब्रह्मांड देश में अमांडी मन से मिला हुआ कोई भारी सुरत का केंद्र होना चाहिए जिसकी मदद से ब्रह्मांडी मन ब्रह्मांड की संभाल करता है । वैदिक धर्म या वेदांत - फिलॉसफी को इस केंद्र की निसचत इसके वजूद की हस्ती के सिवाय और कुछ तहकीक मालूम नहीं है । चुनाँचे इसने " नेति " ," नेति " यानी “ यह नहीं है " , " यह नहीं है " कह कर ही इसकी तरफ इशारा किया है । संतमत में इसी को परब्रह्मपद कहते हैं मगर मालूम हो कि यह पद ब्रह्म से ऐसा ही अलहदा है जैसा कि हमारी मुरत का केंद्र हमारे मन से मलहदा है और इन दोनों का आपस में संबंध भी उसी तरह पर है जैसा कि हमारी सुरत का हमारे मन के साथ है । एतराज किया जा सकता है कि जब इन दोनों ( ब्रह्म और परब्रह्म ) पदों को अलग अलग कहा जाता है तो इनमें बाहमी संबंध कैसे हो सकता है । जवाब में हम पूछते हैं कि दुनिया को हर चीज़ के अंदर तीन नापों में वाहमो तफावत व मेल दोनों मौजूद है या नहीं ? मसलन् मोटाई का नाप और चौड़ाई का नाप दोनों अलग अलग चीजें हैं लेकिन मोटाई और चौड़ाई दोनों हमेशा इकट्ठी हो देखने में आती हैं यानी जहाँ पर मोटाई है वहाँ चौड़ाई भी है और जहाँ पर चौड़ाई है !!



Wednesday, October 28, 2020

ज्ञानद्रिय और कर्मेंद्रिय की धारें !!............

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19 - ज्ञानद्रिय और कर्मेंद्रिय की धारें

     स्थूल शरीर , इंद्रियों और छः पो का सप काम दो मुख्य धारों की मारफेत चलता है जिनका हाल मुरतसर तौर पर नीचे लिखा जाता है ।

     पहली अंतर्मुखी धार - जो नक्श बाहर से ज्ञानेंद्रियों पर पड़ते हैं उनको यह धार अंदर पहुँचाती है और शरीर के पालन पोषण व पढ़ने के लिये जान भी इसी धार की मारफत मिलती है । यह मुरत की धार है और अंतर्मसी और आकर्षक है । इसका इजहार खास कर दो रूपों में होता है , जिनमें से एक को बोधनात्मक ( Sensory ) और दूसरे को रचनात्मक (Structural) कहते हैं । बोधनात्मक का मतलब बोधन यानी शान कराने वाला और रचनात्मक का मतलब शरीर रचने या तैयार करने वाला है । अब्बल किस्म का इजहार मानसिक क्रियाओं वाले सब जानदारों के अंदर देखने में भाता है । ये क्रियाएँ रगों और दूसरी सूक्ष्म नालियों की मारफत हुमा करती हैं । सुरत - धार का बोधनात्मक अंग रचनात्मक अंग के मुकाबले में ऊँचा दर्जा रखता है । इस पुस्तक के रचना भाग में इस अंग के मुतमल्लिक हम मुफस्सल जिक्र करेंगे । रचनात्मक अंग अग नीचा दर्जा रखता है ताहम रचना के काम के लिये यह निहायत जरूरी है । भागे चल कर रचना के बयान पपान में इन दोनों अंगों में जो परस्पर संबंध है उसका भी मुफस्सल बयान करेंगे । जानदारों के अंदर दूसरा अंग पहले अंग के पासरे ही काम करता है क्योंकि उनके स्थूल और सूक्ष्म घाटों से बोधनात्मक अंग बिलकुल जाते रहने पर रचनात्मक अंग का भी काम बंद हो जाता है और आखिरकार शरीर मुर्दा हो जाता है ।

      दूसरी बहिर्मुखी धार - इसका काम मन के अंदर इरादा कायम करना ( इच्छा उठाना ) , देह और इंद्रियों का चलाना , खुजले का खारिज करना और संहार - क्रिया करना है । मनुष्य - शरीर में सब बहिर्मुखी इंतजाम - शारीरिक व मानसिक - इसी धार की मारफत होता है । यह घार मन से प्रकट होती है । वनस्पति - योनि में इरादे यानी इच्छा की क्रिया का बिलकुल अभाव रहता है और देह का चलाना सिर्फ शरीरपृद्धि यानी जिस्म के पढ़ने की शक्ल में दिखलाई देता है मगर बाकी के दो खवास पानी फुजला निकालने और संहार करने के काम इस योनि में जानदारों के मुताबिले में अगर ज्यादा नहीं तो परापर प्रबल जरूर रहते हैं । मन , जो कारकुन यानी चलायमान होने पर सब मानसिक क्रियाओं में शामिल होता है , बनस्पति - योनि में सोया रहता है और ऐसे ही सुरत भी बलिहाज योधनात्मक क्रियाओं के इस योनि में अचेत रहती है । यह बहिर्मुखी धार भी सुरत - धार के रचनात्मक अंग की तरह उसके बोधनात्मक अंग के आश्रित रहती है । क्योंकि इसके पूरे तौर पर खिंच जाने से बहिर्मुखी धार का मी सब काम बंद हो जाता है ।

     ऊपर के लेख से जाहिर है कि सुरत और मन दोनों की धारों के बाहम मिल कर काम करने से मनुष्य - शरीर और उसके छः चक्र तैयार हुए हैं और सुरत मन के पर्दे के द्वारा शरीर के अंदर ताकत , जान और चेतन खवास बहम पहुँचाती है ।



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Tuesday, October 27, 2020

१८ - मनुष्य - शरीर में छः चक्र ।

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१८ - मनुष्य - शरीर में छः चक्र

      ऊपर की दफ्रा में बयान किये हुए तीन मुख्य विभागों के अलावा , जिनको पालमे सगीर के तीन बड़े दर्जे कहना चाहिए , पहले विभाग यानी शरीर के अंदर छः उपभाग देखने में आते हैं जिनको पट - चक्र कहते हैं और जिनकी तफसील यह है : खारिज करना है ।

      ( १ ) गुदाचक्र यानी मूलाधार - इसका काम फुजला यानी मल

      ( २ ) इंद्रियचक्र - इसका काम प्रौलाद पैदा करना यानी ऐसे बीज का बनाना है जो तरको पा कर अस्वीर में मनुष्य - बोला बन जावे ।

       ( ३ ) नामिया - इसका काम खाना हजम करना और तमाम शरीर की परवरिश करना है ।

       ( ४ ) हृदयचक्र - यह छाती की हड्डी के निचले सिरे के करीब , जिसको कौड़ी का मुक्काम कहते हैं , वाकै है । इसका काम तमाम शरीर का चंदोबस्त करना है । संकल्प विकल्प सब इसी स्थान से पैदा होते हैं । रंज व सुशी और उम्मीद व खौफ बगैरह का असर इसी मुकाम पर होता है । अक्सर ऐसा हुआ है कि दिल की हरकत और नब्ज की चाल बंद हो जाने पर यह चक्र अपनी क्रिया बदस्तूर करता रहा और दुःख मुख वगैरह का अनुभव और ज्ञानेंद्रियों व कर्मेंद्रियों की क्रिया भी कुछ देर तक बदस्तूर जारी रही लेकिन जब इस चक्र पर कोई ऐसी चोट लग गई कि जिससे इसकी क्रिया बिलकुल रुक गई तो शरीर का सबका सब कारखाना मानसिक क्रियाओं के समेत कतई बंद हो गया ।

       ( ५ ) कंटचक्र - इसका काम सूक्ष्म प्राण का रवाँ यानी चालू रखना है ।

       ( ६ ) छठाचक्र - जो दोनों आँखों के मध्यस्थान में नाक की जड़ से करीब एक इंच अंदर की जानिय चाकै है और सुरत यानी रूह की नशिस्त या बैठक का मुकाम है ।

      नीचे के चार पक्रों की क्रियाएँ कम व पेश प्रकट है और हर फोई उनको समझता है लेकिन ऊपर के दो चक्रों की क्रियाएँ सिर्फ उन घास शगलों या साधनों की कमाई करने से जानी और परखी जा सकती हैं जिनका मागे पल कर जिक्र किया जायेगा । इन साधनों की कमाई के दौरान में वे सब सुरत के सिंघाच की हालतें , जो मृत्यू रमना है । से पहले और मृत्यु होने पर जीव पर पाती हैं , होश व हवास कायम रहते हुए दर्जे बदर्ज अभ्यासी पर गुजरती हैं और उस वक़्त जो तजरुवे प्राप्त होते हैं उनके द्वारा हमारे ऊपर के लेख की दुरुस्ती की काक्री व शाकी अमली जाँच हो सकती है । ग्राइंदा चल कर अगर वैज्ञानिक लोग ऐसी तरकीचे निकाल लेवे कि जिनके जरिये से मरते हुए इंसान के जिस्म में जिंदा और मुर्दा हिस्सों के बाहमी फर्क की तमीज़ हो जावे तो उनकी मारफत भी हमारे ऊपर के लेख की तसदीक हो सकती है और गालियन इस क्रिस्म की तसदीक वैज्ञानिक दृष्टि से ज्यादा तसल्लीबश होगी ।



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Monday, October 26, 2020

सावन मास सुहागिन आया । रोम रोम अंग अंग हरपाया ॥

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प्रेम बिलास

शब्द 

                सावन मास सुहागिन आया ।

   रोम रोम अंग अंग हरपाया ॥

           प्रेम घटा के बदला छाये ।

        रिमझिम रिमझिम बरपालाये ॥1 ॥

                 भक्ति प्रेम की गहरी नदियाँ ।

     बहन लगी सब ताल तलैयाँ ॥

                 लाल हुईं सब सखियाँ प्यारी ।

         भूल गईं तन मन सुधि सारी ॥2 ॥

                 संत अनुराग यह औसर पाया ।

        प्रेम संजोग मन अधिक सुहाया ॥

                 चरन अधीन सुरत रंगीली ।

        गुरु अधार से भई सजीली ॥3 ॥

                  सरन अधीन गहे गुरुचरना ।

         नाम रसायन हुआ मन मगना ॥

                  प्रेमदुलारी सुरत शिरोमन ।

             नाम अधार रहे स्वामी चरनन ॥ 4 ॥

                  नामप्रताप की महिमा भारी ।

      चरनप्रसाद हिये विच धारी ॥

                  सतगुरुप्यारी सुरत अलबेली ।

           हुई अचिन्त अब सन्तसहेली ॥5 ॥

                  प्रेमभरी हुई नाम की लोई ।

        सुरत निरत दई चरन समोई ॥

                  प्रेमसरूप शब्द की छुनछुन ।

             साहबगोद मगन रहे सुन सुन ॥6 ॥

                  प्रेम की धारा बही अस भारी ।

       भींज गई रचना सब सारी ॥

                  साहवदास मगन होय खेलें ।

           नाम अधीन सुरत को मेलें ॥7 ॥

                  करम भरम घर अगिनी लागी ।

          संत विश्वास प्रीति हिये जागी ।।

                  सतसंगी सब जुड़ मिल आये ।

           सत्तपुरुष डिंग आरत लाये ॥8 ॥

                  अरव खरव का मरम पिछाना ।

             राधास्वामी पद को किया पयाना ।

                  चरनअम्बु में गोता मारा ।

         हैरत हैरत वार न पारा ।।9।।

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मनुष्य - योनि के तीन बड़े हिस्से

१७ - मनुष्य - योनि के तीन बड़े हिस्से ।




     मनुष्य के स्थूल शरीर और उसकी मानसिक क्रियामों की जाँच करने से मालूम होता है कि मनुष्य में तीन मुख्य चीजें   हैं :-  

      ( १ ) बाहरी जामा या शरीर और उसके अंदर कायम इंद्रियाँ ये पृथ्वी , जल , वायु , अग्नि और आकाश तत्वों को मिलौनी से और प्रकृति की उन सब जड़ शक्तियों की मदद से , जो चेतन - शक्ति का मुख़्तलिफ पदों की मारफत इजहार होने से उत्पन्न होती हैं , तैयार

      ( २ ) मन - इसकी बैठक अन्तःकरण में है जिसके चार अंग हैं : अव्वल मन , जिससे अंतर में खपालात पैदा होते हैं । दूसरा चित्त या तवज्जुह की धारें , जिनके द्वारा खयालात मुख़्तलिफ वस्तुओं की जानिव मुखातिब किये जाते हैं और उनके संग जोड़े जाते हैं । 

     तीसरा बुद्धि , जिसके द्वारा मनुष्य को कुल बातों का बोध होता है यानी समझ पाती है और जो तवज्जुह की धार के एकत्र होने से प्रकट होने वाला प्रकाश है । चौथा अहंकार , जिससे में व तू की तमीज कायम होती है । 

     ( ३ ) सुरत यानी चेतन - शक्ति - यह पहली दो चीजों यानी शरीर और मन को जान देती है और इसकी सहायता के बगैर वे दोनों बेकार रहते हैं ।



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Saturday, October 24, 2020

14 - परमार्थ के उद्देश्य की प्राप्ति ।

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14 - परमार्थ के उद्देश्य की प्राप्ति

      ऊपर की दफा से पता चल जाता है कि इस पुस्तक के शुरू में परमार्थ का जो उद्देश्य कायम किया गया उसकी प्राप्ति कब और कहाँ पहुँचने पर हो सकती है , क्योंकि यह दरयाफ़्त हो गया है कि सुरत जब सच्चे कुल मालिक के निर्मल चेतन - धाम में दाखिल होगी तो अजर और अमर हो जायेगी और सब प्रकार के दुःख व फ्लेश से छुटकारा पाकर कुल मालिक के दर्शन के परम आनंद में सदा मग्न व सरशार रहेगी ।

15 - सुरत और उसका भंडार

      यह मालूम होने पर कि किस गति के मिलने यानी किस देश में पहुंचने से परमार्थ के उद्देश्य की प्राप्ति जीव के लिये मुमकिन है , यह दरया : प्त करना जरूरी हो जाता है कि कुल मालिक का वह देश कहाँ पर वाकै है और सुरत अंश पानी पंथी का मौजूदा हालत में कयाम किस जगह पर है ; क्योंकि बगैर ये दो बातें तप किये जो भी यत्न या उपाय तजवीज होंगे वे मुहमल यानी अनिश्चित होंगे और उनके धन परने व न बन पड़ने को निसबत कोई राय कायम न की जा सकेगी । इस लिये पहुँचना कहाँ है और चलना कहाँ से होगा , अब इन्हीं दो पातों की निसबत तहकीकात करते हैं ।

       यह बयान किया जा चुका है कि चेतन - शक्ति ही इस रचना में आदि - शक्ति ( Prime Energy ) का मस्रजन यानी सोत है और प्रकृति की सय शक्तियाँ इसी के पासरे कायम हैं । ऐसी सूरत में यह खयाल करना गलत न होगा कि चेतन - शक्ति में और प्रकृति की शक्तियों में बहुत सी सिफतें मिलती जुलती मौजूद होंगी और यह भी मानना गलत न होगा कि प्रकृति की शक्तियों के मुबाफिक चेतन - शक्ति में उसके निज भंडार के सपास का असर मौजूद रहता है और जब चेतन - शक्ति की धार किसी मुकाम पर एकत्र हो कर कोई केंद्र या नुक्ता ( Focus ) कापम करती है तो उस मुकाम पर दशा आदि भंडार की दशा से कुछ कुछ मुशावह होनी चाहिए और अगर धार को एकत्र करने वाले शीशे या पदें का मसाला किसी तरह की रुकावट न डाले तो उस मूरत में केंद्र की दशा और श्रादि - भंडार की दशा में मुकम्मल मुशाबहत होगी । मतलब यह है कि जैसे आतिशी शीशे से गुजरने पर सूरज की किरनियाँ बाहर एक केंद्र ( Focus ) पनाती हैं और उस केंद्र की शक्ल सूरत और नोज बहुत से दूसरे अंग किरनियों के भंडार यानी सूरज से मुशावह रहते हैं और जिस कदर शीशा साफ होता है उसी कदर केंद्र मी साफ और सूरज के ठीक मुशायह होता है ; ऐसे ही चेतन - शक्ति की घारों से बने हुए केंद्र भी दरमियानी शीशे या पदं के विलकुल साफ शाकाक होने की सूरत में चेतन - शक्ति के भंडार के मुशावह होने चाहिए । लेकिन इस स्थूल सृष्टि में शीशे या पर्दे के नाकिस होने की वजह से इस तरह को मुकम्मल मुशावहत रखने वाली सूरतें बिलकुल दुर्लभ हैं । अलपना मनुष्य - चोले में , जो कि पृथ्वी पर चेतन - अंश की सबसे बढ़ कर चेतन अवस्था है , चेतन - भंडार की बहुत कुछ नकल देखने में आती है । इस लिये रचना यानी पालमे कबीर का हाल जानने और उसके मुतलिफ भागों की तकसीम समझने और परम आनंद का धाम तहकीक करने के लिये सबसे सहल और असली तरीका मनुष्य - शरीर का भेद दरयाफ्त करना करार पाता है । अगर कोई यह हौसला करे कि पढ़िया पालाजात और औजारों की मदद से पालमे कबीर की रचना का भेद जान ले तो बिलकुल येमसरफ होगा , क्योंकि भाले औजार बेचारे क्या करेंगे जब कि खुद हमारी ज्ञानेंद्रियों की , जिन पर अाले और औज़ार लगाये जावेंगे , इस रचना के नीचे ही दर्जे के बहुत से सूक्ष्म मंडलों में कोई गति यानी पहुँच नहीं है । इसलिए रचना का भेद समझने के वास्ते चेतन - भंडार से आए हुए किरणरूपी सुरत - अंश का हाल दरयाफ्त करना ही बन पड़ने वाला तरीका रह जाता है ।

16 - सुरत का निज भंडार

      यह पीछे बयान कर आये हैं कि सुरत सत् , चित् भौर भानंद रूप है । अब हम चाहते हैं कि यहाँ पर संसार के उन आला से पाला यानी हद दर्जे के आनंद वगैरह की खयाली तसवीर पेश करें जो जीव के तजरुबे में आ सकते हैं , क्योंकि इसकी मदद से चेतन - शक्ति के आदि और निज भंडार यानी सच्चे और परम समर्थ कुल मालिक की अवस्था का किसी कदर अनुमान हो सकेगा ( हरचंद यह अनुमान निहायत पोछा और स्थूल होगा ) । हम विचार सकते हैं कि परम सुहावन रूपों के खपाल में आने , महा प्रकाशवान और तीक्ष्ण पुद्धि के चमकने , अत्यंत मनोहर राग के अलापने , परम सुंदर रूप के दरसने और दूसरी इंद्रियों के मुतअल्लिक आला दर्जे के रस प्राप्त होने पर , जिनकी वजह से इंसान हर दर्जे का सरशार और अजखुदरफ़्ता हो जाता है , हमारे अंदर क्या हालत होती है । अब अगर इंसान के वजूद में मुकीम सुरत अंश के अंदर , जो कि निहायत ही कम हकीकत किरण चेतन - शक्ति की है और अंशी निज - भंडार के मुकाबिले में जिसकी कोई हैसियत नहीं है , काबिलियत इस कदर मग्न प रत होने की मौजूद है तो अंशी चेतन - भंडार के परम पानंद , परम ज्ञान और परम सत्ता की कैफियत का क्पा वार पार हो सकता है । वह चेतन - भंडार कुल - मालिक का धाम है और उसमें परम शक्ति , परम आनंद और परम मुख ही का राज्य है और किसी तरह के रह व बदल व क्षीणता का वहाँ पर दखल नहीं है और वह घाम अमर व अविनाशी है । कुल मालिक और उसके धाम का रचना के और स्थानों और उनके पासियों से क्या संबंध है यह आगे चल कर तफसील के साथ बयान करेंगे । इस वक्त सिर्फ इस कदर जतलाना चाहते हैं कि हरचंद कुल मालिक को किरनियाँ हर जगह मौजूद हैं लेकिन उसका निज धाम एक अलग ही धाम है और वह मन और माया के मंडलों से परे वाकै है । मन और मापा के मंडल कुल मालिक के घाम से अलहदा बतलाने पर अगर कोई एतराज करे कि वह मालिक अनंत व अपार नहीं रहता , तो हम सवाल करते हैं कि आकाश के अंदर बादल का एक टुकड़ा मौजूद होने से क्या आकाश की अनंतता व अपारता जाती रहती है ।

 ( मुलाहिजा करो दफा ६ ९ भाग तीसरा ) ।



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Wednesday, October 21, 2020

सुरत यानी चेतन - शक्ति ही आदि - शक्ति है ।

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12 - सुरत यानी चेतन - शक्ति ही आदि - शक्ति है  



    अब हम लौट कर चेतन - शक्ति की तरफ आते हैं और उसकी परीक्षा शुरू करते हैं । मुनासिब होगा कि जो अमल पर्दे यानी शिलाफ दूर करने का प्रकृति की शक्तियों पर लगाया गया था यह चेतन - शक्ति पर भी लगा कर देखा जाये कि ऐसा करने से चेतन - शक्ति का क्या हाल होता है । इसके लिये मौत और सक्ते या मूर्छा वगैरह की अवस्थाओं की जाँच करना मुनासिप होगा क्योंकि इनमें से पहली पानी मौत की अवस्था में स्थूल शरीर का पर्दा बिलकुल अलहदा हो जाता है और बाकी की अवस्थाओं में यह बेकार रहता है । मनुष्य के मंदर मामूली तौर पर गुरत के चार सपास देखने में आते हैं अव्वल ज्ञान लेना , दूसरे दुःख सुख का अनुभव करना , तीसरे संकल्प विकल्प पानी सपालात उठाना व दूसरी मानसिक क्रियाएँ करना और चौथे ताकत पा जान देना , जिसकी मदद से खाना हजम हो कर शरीर तैयार होता है । लेकिन ये चारों सवास प्रेत - योनि के अंदर भी दिखलाई पड़ते हैं और सक्ते की हालत हो जाने पर भी देखने में भाते हैं बल्कि स्थूल देह की क्रिया हटने या बंद होने पर अलावा इन खवास के कायम रहने के मनुष्य के अंदर मान लेने की ऊँचे दर्जे की शक्तियाँ और आगामी पानो होनहार पातों के जानने व साधारण मनुष्य - गति से परे के पाट में प्रवेश करने वगैरह की ताकतें जाग उठती हैं । इससे लाजिमी तौर पर नतीजा निकलता है कि प्रकृति की शक्तियों के दस्तूर के खिलाफ चेतन शक्ति के शिलाफ पानी पर्दै दूर होने पर उसके सब के सब खवास परापर कायम रहते हैं । इस लेख में प्रेत - योनि का जो हमने जिक्र किया है उससे यह नहीं समझना चाहिए कि देह छोड़ने पर सभी जीव प्रेत - योनि को प्राप्त होते हैं । इस पुस्तक के तीसरे माग के दफा ११४ में हम बयान करेंगे कि देह छोड़ते यात जीव पर क्या हालत गुजरती है और अनेक दजों के जीव जो इस रचना में विचर रहे हैं उनके लिपे मौत के बाद का इतनाम फिन नियमों के अनुसार होता है । यहाँ पर प्रेत - योनि का जिक्र सिर्फ इस रारत से किया गया है कि प्ररपक्ष गुप्त पेश करके यह साबित किया जाये कि स्थूल शिलाफों के अलहदा होने पर गुरत के निज खपास न सिर्फ बदस्तूर कापम रहते हैं पल्कि उनका इजहार पादा वेग के साथ होने लगता है ।

     पीछे दफा ९ मे बयान किया गया है कि हमारा मन एक ऐसा भौशार है कि जिसके द्वारा सुरत अपनी मालिक मानसिक क्रियाएँ करती है । जब मन को मानसिक क्रिया करने का औजार कहा तो मानना होगा कि मन भी एक पर्दा ही है जिसकी मारफत मानसिक क्रियाओं का इजहार होता है । दफा २१ में आगे चल कर हम दिख लायेंगे कि चेतन - शक्ति कैसे मन को मदद के बगैर अपने निज खवास का इजहार कर सकती है । इस वक्त सिर्फ इस कदर जतला देना काफी होगा कि मुरत के ऊपर से दर्जे बदजें स्थूल व सूक्ष्म पर्दे हटने पर इसके निज खवास ज्यादा ही ज्यादा रोशन होते जाते हैं और अगर इसके ऊपर से तमाम के तमाम पदें स्थूल व सूक्ष्म दूर कर दिये जावें तो प्रास्त्रीर में सुरत यानी चेतन - शक्ति शुद्ध - स्वरूप हो जावेगी और उस अवस्था में यह शक्ति आदि - शक्ति , ज्ञान और आनंद का मखजन यानी सोत नमूदार होगी ।

     अगर ऊपर को सब दलीलें दुरुस्त हैं तो नतीजा निकलता है कि प्रकृति की तमाम शक्तियों का वजूद चेतन - शक्ति के आधार ही पर कायम है और इस नतीजे की दुरुस्ती जानवरों व वनस्पतियों के बीजों के उगने व परवरिश पाने को निमबत जो कुदरत में इंतजाम है उस पर निगाह डालने से साबित होती है । चुनाचे देखने में आता है कि जब तक मुरत यानी रूह का किसी देह के अंदर निवास रहता है सब तत्व और प्रकृति की शक्तियाँ बाहम ( परस्पर ) मेल से काम करती हैं और उस देह के कायम रखने और बढ़ने में मददगार रहती हैं , लेकिन जिस दम सुरत देह से अलहदा हो जाती है , सब का सब कारखाना उलट जाता है और ये शक्तियाँ और तस्त्र तोड़ फोड़ की काररवाई शुरू कर देते हैं और अंत में जहाँ से वे आये थे वहाँ लौट जाते हैं । अगर मुरत अंश की निसवत यह उसूल दुरुस्त है कि उसके स्थूल देह का वजूद गुरत अंश की मदद से कायम होता है और उसी के आसरे कायम रहता है तो उसके अंशो यानी सुरत के मंडार सत् - करतार की निसवत इस उसूल का दुरुस्त होना और भी ज्यादा लाजिमी ठहरता है और इससे सावित होता है कि उस सत् - करतार हो को चेतन धारों के प्रताप से यह तमाम रचना रूपवती हुई है और इसके कपाम और इंतजाम के लिये अटेल और दानाई में मुकम्मल नियम उसी आदि कारण ने कायम किये हैं ।

13 - पुराने जमाने के पाँच मूल तत्त्व

   परमाणुओं की जिस विभक्त दशा का ऊपर वर्णन हुआ पुराने जमाने में उस अवस्था को प्राप्त प्रकृति को बुजुर्ग लोग अग्नि तत्व कहते थे । इसी तरह पर पाकी के और चार तत्व भी प्रकृति की दूसरी चार ( ठोस , तरल , वायव्य और आकाशीय ) अवस्थाओं के नाम थे । लोगों का यह खयाल ग़लत है कि साधारण मिट्टी और पीने के जल वगैरह को वे लोग इन नामों से पुकारते थे । घरखिलाफ इसके जैसा कि बयान किया गया प्रकृति यानी माद्दे की ठोस , तरल वगैरह अवस्थाएँ ही मूल तत्व कहलाती थीं यानी कदीम बुजुर्गों का मतलब पाँच मूल तत्वों से उन पाँच अवस्थाओं को प्राप्त प्रकृति से था जो निहायत उत्तम वैज्ञानिक रीति से दर्जे बदर्जे कायम हैं

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Monday, October 19, 2020

🙏🙏 चेतन - शक्ति और प्रकृति की स्थूल शक्तियों में भेद । 🙏🙏

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11 - चेतन - शक्ति और प्रकृति की स्थूल शक्तियों में भेद


      मालूम हो कि चेतन - शक्ति प्रकृति की स्थूल शक्तियों की मिलौनी का परिणाम नहीं है । और अगर कोई ऐसा खयाल करे कि सुरत जड़ शक्तियों की मिलौनी का परिणाम है तो उसकी भूल प्रकृति की शक्तियों की मौजूदा हालत पर नज़र डालने से साबित हो सकती है । देखिये , संसार में जितनी भी स्थूल शक्तियाँ मुख़्तलिफ प्रसिद्ध रूपों में अपना इज़हार कर रही हैं उनमें एक भी ऐसी नहीं है कि जिसका इस मंडल में कोई गुप्त खजाना यानी भंडार मौजूद न हो । अगर यह दुरुस्त है तो इस हिसाब से चेतन - शक्ति का भी कहीं पर भंडार मौजूद होना चाहिए । स्थूल शक्तियों के गुप्त खजाने मौजूद होने के सबूत में एक मिसाल पेश करते हैं । फर्ज करो कि कोई मोमबत्ती दियासलाई लगा कर रोशन की जाती है । सवाल होता है कि पत्ती के रोशन होने का कारण क्या है ? अगर प्टि सिर्फ जलने की क्रिया पर , जिससे शोला पैदा हो रहा है , रक्खी जावेगी तप तो जयाप यही होगा कि जलने की वजह से पनी रोशन हो रही है यानी जलने की क्रिया ही पत्नी के रोशन होने का कारण है । लेकिन यह दुरुस्त नहीं है । दरमसल बात यह है कि जलने पाले मसाले के परमाणुओं के अंदर जो विशिष्ट - ताप पानी स्वाभाविक गुप्त अग्नि मौजूद है यह अपने आप को बड़े पेग के साथ प्रकाशित करती है और इससे पती रोशन हो रही है । यही स्वाभाविक गुप्त अग्नि या हरारततपई प्रकट होने वाली अग्नि का गुप्त खजाना यानी भंडार है जिसके बगैर अग्नि का प्रकाश कतई नामुमकिन है । मालूम हो कि प्रकृति की दूसरी शक्तियों के लिए भी ठीक ऐसा ही इंतजाम है । और अगर चेतन - शक्ति पर यह उगल लगाया जाये तो नतीजा निकलता है कि चेतन शक्ति का भी इस रचना में कहीं पर गुप्त मंढार व मखगन मौजूद होना चाहिए । दृष्टान्त की मदद से हरचंद पहाँ पर चेतन शक्ति के गुप्त भंडार की मौजूदगी साबित कर दी गई , लेकिन यह मुप्त हमारा काफी नहीं है , क्योंकि दृष्टान्त द्वारा कापम किये हुए अनुमान हमेशा प्रामाणिक नहीं होते ; और जोकि हमको वैज्ञानिक रीति से तहकीकात करनी मंजूर है इस लिए गुप्त में हमको असली वाकपात यानी तजरुचे की पाने पेश करनी मुनासिब हैं ।

      दफा १० में हमने जरूरत इस बात की दिखलाई थी कि प्रेत विद्या के जानने वालों ने जो बहुत सी अजीप व रारीप बातें पपान की है उनकी वैज्ञानिक लोग मुनासिब जाँच करके या तो हमेशा के लिये उनको मान लें पा रद कर दें । चुनांचे प्रेत - विद्या के माहिर कहते हैं फि प्रेत - योनि के होने में कतई पह नहीं है । अगर सायंस इस मन को तसलीम कर ले तो यह साबित करने के वास्ते कि चेतन - शक्ति अपने कपाम के लिए स्थूल देह की महताज नहीं है , पानी बगैर स्थूल देह के भी उसका वजूद पना रहता है , एक पड़ी पक्की और लाजवाब दलील हमारे हाथ लग जाती है । अलावा इसके अगर यह मी मात्र लिया जावे कि भूत प्रेत ऐसे मुकामात में आसानी से घुस जाते हैं जहाँ साधारण तीन नापों के कायदे के अंदर बरतने वाला यानी स्यून देहधारी नहीं पहुँच सकता तो नतीजा निकलेगा कि प्रेत - योनि के जीव आकाश ( ईथर ) के से चौसाफ में बरतने की काबिलियत रमते हैं । और नीज़ इस तरह के बहुत से वाकपात बयान किये जाते हैं जिनमे जाहिर होता है कि ये जीव स्थूल देह को ब्यापने वाली गर्मी सदी जरा मी महसूस नहीं करते । अगर यह मी दुरुस्त निकल आये तो प्रेत - योनि में जीव की देद का आकाशिक होना पायेमुचूत को पहुँच जाता है ।

      क्योंकि मार्यस मानता है कि आकाश ( ईथर ) पर गर्मी की किरणों का ज्यादा असर नहीं होता । पाकाशिक देहों की हस्ती यानी सत्ता मानने मे मौजूदा कीटाणुवाद ( Germ Theory ) में , जिसका दावा है कि खास दर्जे की हरारत यानी गर्मी के बाद कोई कीटाणु ( Germ ) कायम नहीं रह सकता , कुछ तबदीली करनी होगी , क्योंकि जब आकाश ( ईथर ) पर गर्मी का ज्यादा असर नहीं होता तो किसी मी दर्जे की गर्मी मौजूद रहते हुए आकाशिक देबारी निहायत सहलियत से जिंदा रह सकते हैं । इस लिए यह कहना कि वास दर्जे की गर्मी से आगे बढ़ने पर जिंदगी का बीज यानी कीटाणु कायम रह ही नहीं सकता , गलत हो जाता है । इस सूरत में कीटाणुवाद ( Germ Theory ) का सिर्फ इस कदर दावा टीक रह जाता है कि खास दर्ज की गर्मी से आगे बढ़ने पर स्थूल देह वाले कीटाणु निंदा नहीं रह सकते लेकिन आकाशिक और दूसरी सूक्ष्म देह वाले कीटाणुओं से इस बाद ( Theory ) का कोई तअल्लुक नहीं रहता । ऊपर के बयान से इतना और नतीजा निकालना बेजा न होगा कि इस पृषी पर जो अनेक स्थूल श्रेणी की योनियाँ देखने में आती हैं वे हमारी मानेंद्रियों की गम्य से परे के ऐसे मूरम मंडलों से उतर कर पाई हैं जिनमें इस पृथ्वी के मानिंद जिंदगी का इजहार और योनियों की भरमार है । अगर यह मी नतीजा दुरुस्त मान लिया जाये तो उस हालत में तो मौजूदा कीटाणुवाद ( Germ Theory ) के एकदम पाँच उखड़ जाते हैं ; क्योंकि फिर यह कहने के लिए क़तई गुंजाइश नहीं रहती कि स्थूल कीटाणुओं ही से रफ़्ता रफ़्ता तरक्की पाकर ऊँचे दर्जे वाली योनियाँ प्रकट हुई हैं । वरखिलाफ इसके यह मानना होगा कि स्थूल कीटाणु ऊँचे दर्जे के चैतन्य मंडलों व मत्रजनों से झड़ी हुई कमजोर और खफ़ीफ़ छींटे हैं । यह खयाल प्रकृति की शक्तियों की निसबत जो कुछ सजरुबे में आता है उससे मेल भी खाता है , क्योंकि देखने में आता है कि पृथ्वी पर गर्मी , रोशनी वगैरह शक्तियाँ ऊँचे दर्जे के मखजनों ही से आ रही हैं ।

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१२४ - रचना की दया किस रारज से हुई

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